Tuesday, April 12, 2016

कॉमेडी को किसी दायरे में बांधना उचित नहीं : वीर दास

संता बंता के जोक से तो सभी परिचित हैं।  लेकिन फिल्म 'संता बंता' की  क्या खासियत है ?
- फिल्म की खासियत बताऊँ तो  इसकी कॉमेडी बहुत सिम्पल है, इनोसेंट है। इसमें कोई डार्कनेस नहीं है और न ही किसी तरह की होशियारी है। इसके दोनों पात्रों का दिल बिल्कुल सच्चा है, साफ है। कई सफल कॉमेडियन एक साथ काम किये हैं। फिल्म की शूटिंग फिजी के अच्छे लोकेशन में की गई है। ये बहुत स्वीट किस्म की फिल्म है। संता बंता दो दोस्त हैं। संता ने बंता को बचपन से सम्भाला है . दोनों पंजाब में रहे हैं . सरकार ने उन्हें एक सीक्रेट मिशन पर फिजी जाने के लिए हायर किया है।
आप एक सफल स्टैंडअप कॉमेडियन हैं। आपके लिए तो ये फिल्म आसान रही होगी ?
-आसान तो कोई फिल्म नहीं होती। दूसरे मैं पंजाबी भी नहीं हूँ। ऐसे में मुझे डॉयलॉग और लुक पर काफी काम करना पड़ा। बोमन के साथ मैंने पहले कभी काम नहीं किया था। लेकिन हम दोनों के बैकग्राउंड थिएटर है तो रिहर्सल भी किये थे।

आजकल कॉमेडी को लेकर विवाद भी हो रहे हैं।  क्या इसके लिए भी कोई आचार संहिता होनी चाहिए ?
-कॉमेडी के लिए किसी ना किसी को आधार बनाना ही पड़ता है। दर्शक को समझना चाहिए कि हर एक जोक किसी के ऊपर ही बनाया जाता है।  मैं नहीं समझता की कॉमेडी को किसी तरह के दायरे में बांधना चाहिए। अगर किसी को कोई जोक नहीं पसंद है, तो वो स्वतंत्र है कि उसे ना देखे। 

स्टैंडअप कॉमेडी और थियेटर की चुनौतियों में किस तरह की समानता और भिन्नता देखते हैं ?
-थियेटर में कई लोग होते हैं, जिनसे आपको मदद मिलती रहती है। सारा दारोमदार केवल एक व्यक्ति पर नहीं होता। थियेटर में सबकुछ एक प्लान के तहत सुनिश्चित होता है। थियेटर इंडिया में बहुत पुराना है। इसका आर्ट लेवल बहुत ऊंचा है। थियेटर दर्शक को गंभीर सोच में ले जा सकता है। लेकिन स्टैंडअप कॉमेडी में आप अकेले होते है। दूसरे इसकी दिशा भी पूर्व निर्धारित नहीं होती। आपको ऑडियंस का मूड भांपते हुए चलना पड़ता है। इसका ओर-छोर कहीं भी जा सकता है। हमारे यहां स्टैंडअप कॉमेडी नयी है। इसमें हमारा मकसद दर्शकों को सिर्फ हंसाना होता है। 

आपके पॉजीटिव और निगेटिव पॉइंट क्या हैं ?
-मेरा पॉजीटिव पॉइंट है कि मैं हमेशा एक्साइटेड रहता हूं। काम को लेकर सीरियस हूं और बहुत ही मेहनती हूं। मुझमें निगेटिव बात ये है कि मैं सोता बहुत कम हूं। घर पर ज्यादा समय नहीं दे पाता। क्योंकि कई करियर है। सबको संभालते चलना है। 

आप 2007 से फिल्म इंडस्ट्री में हैं। अपना मूल्यांकन किस तरह कर रहे हैं ?
 - देखिये मैंने कभी नहीं सोचा कि फिल्मों में आउंगा। इसलिए मेरी कोई लिस्ट नहीं है। आप इस इंडस्ट्री को देखिये, एक तरह से ये फैमिली ओरिएंटेड इंडस्ट्री लगती है। नजर दौड़ाइये कितने सेलीब्रिटीज के लड़के-लड़की भरे पड़े हैं। यहां हर एक का कोई गॉड फादर है। ऐसे में मैं अपने को खुश किस्मत मानता हूं कि मैं बिना फिल्मी बैकग्राउंड के यहां हूं।

आपके मुकाम में मेहनत और किस्मत का औसत क्या है ?
-मैं १०० फीसदी अंक अपनी मेहनत को दूंगा। क्योंकि मैंने अपने भाग्य के बारे में कभी सोचा नहीं। अगर आप ये सोचेंगे कि मेरी किस्मत कहां से आएगी, तो पागल हो जाएंगे। फिर आप न्यूरोलॉजी करने लगेंगे। मेरा मानना है कि  बस मेहनत पर फोकस करो और करते जाओ।

इस फिल्म की शूटिंग का अनुभव कैसा रहा ?
-बहुत अच्छा रहा। बोमन से मैंने काफी कुछ सीखा। जॉनी लीवर जी का मैं बचपन से फैन रहा हूं। नेहा और लिसा फनी हैं। फिजी हमने बहुत इंजॉय किया। 

एक स्टैंडअप कॉमेडियन में खास क्या होना चाहिए ?
- सबसे महत्वपूर्ण ये है कि जो आपके चश्मे हैं, उनसे आप जिंदगी के बीच क्या देखते हैं। उससे आपको क्या दिखता है। वो अगर स्पेशल न हो तो फिर आप अच्छे कॉमेडियन नहीं बन सकते ।

जोक को लेकर संता बंता जाना पहचाना नाम है। क्या इसी टाइटल से आ रही फिल्म को भी कोई फायदा होगा ?
 -पहले हमने ये सोचा था कि जो इसका टाइप ऑफ़ ह्यूमर है उसे न लिया जाय। यह फैमिली फिल्म है, बच्चों की फिल्म है। संता बंता जोक की एक बड़ी पहचान है, तो उससे पब्लिसिटी में फायदा होना ही है . लेकिन जिस तरह से इसे डायरेक्ट किया गया है  उससे आप फिल्म देखकर इसकी तारीफ़ करेंगे।       

Saturday, January 23, 2016

एक मुलाकात जावेद जाफरी के साथ


'लव फॉरएवर' की सबसे महत्वपूर्ण बात जो ये फिल्म करने का कारण बनी ?
—कहानी क्या है, आपका रोल क्या है, डायरेक्टर और प्रोड्यूसर कौन है? ये चार बाते ही कोई फिल्म साइन करने से पहले महत्वपूर्ण होती है। यही मैंने भी किया। इसकी कहानी कोई बिल्कुल नयी चीज नहीं लेकर आ रही है, हां इंट्रेस्टिंग है। मेरा रोल एक रॉ एजेंट का है। उसे प्राइम मीनिस्टर की बेटी की हिफाजत के लिए भेजा गया है। वहां उस लड़की की सुरक्षा में एक लेडी भी है और वो इस रॉ एजेंट की पूर्व पत्नी है। बात-बात में दोनों में नोंक-झोंक होती रहती है। लेकिन दोनों का एक ही मिशन है, तो साथ काम भी करना है। ये बात मुझे काफी जमी और मैं यह फिल्म करने को तैयार हो गया।

कोई एक समय सीमा तय कर प्यार नहीं करता।  फिर 'लव फॉरएवर' 'टाइटल का क्या औचित्व् ?  
- देखिये भावनाओं में कोई लॉजिक नहीं होता। आप कई गानों में देखेंगे जैसे ' तेरी आंखों के सिवाय दुनिया में रखा क्या है' अब कोई इसका हू बू हू मतलब निकाल कर सवाल कर सकता है, लेकिन यह एक अहसास को व्यक्त करने के लिए लिखी गई लाइन है। इसी तरह 'लव फॉरएवर' टाइटल भी प्यार के जज्बात को व्यक्त करने के लिए रखा गया है।

मिमिक्री में आपकी एक पहचान है।  आपके ख्याल से इसके लिए ख़ास योग्यता क्या होनी चाहिए ?
- ये बिल्कुल पॉवर ऑफ ऑब्जर्वेशन से जुड़ा हुआ विषय है। मैंने केवल मिमिक्री ही नहीं की है, बल्कि देश की कई भाषाओं में काम किया है और उस दौरान को मैंने बारीकी से समझा है। ये समझना पड़ता है कि कौन सा किरदार कैसे बोलेगा, कैसेउठेगा-बैठेगा।  हमारे यहां पता नहीं किसने ये गलतफहमी ला दी कि ये लीड एक्टर हैऔर ये कैरेक्टर एक्टर। अरे भाई लीड एक्टर भी तो एक कैरेक्टर ही होता है। कहना तो एक्टर और सपोर्टिंग एक्ट चाहिए। मेरी कोशिश हमेशा बनने की रहती है। 

आप बच्चों के शो में जज थे। कभी निगेटिव कमेंट करने से पहले मन में बच्चों की भावनाओं को लेकर डर रहा ?
-वुगी-वुगी शो १७ साल चला। हमने इस मामले में काफी बैलेंस रखा। हमेशा कोशिश रही कि किसी का इन्सल्ट न होने पाये। हमने जिसको भी शो में बुलाया, उन्हें प्यार और सम्मान दिया। अगर कभी निगेटिव बातें भी कहनी थी, तो हमने समझाने के अंदाज में कहा।

  आजकल माँ -बाप अपने सपने अपने बच्चों के माध्यम से पूरा करना चाहते हैं। आपने तो नजदीक से देखा होगा। क्या कहेंगे ?
- ये बहुत डेंजरस सोच है। आपने बिल्कुल सही कहा कि आज मां-बाप अपने सपने अपने बच्चों के माध्यम से पूरा करना चाहते हैं। आपको बताऊं आज ज्यादातर लोग चकाचौंध से चौंधियाए हुए हैं। वो ग्लैमर के आकर्षक में इतने फंस चुके हैं कि इसी कल्पना में जीने लगते हैं कि मेरा बेटा टीवी पर आएगा, एड में दिखेगा, उसे काफी फेम मिलेगी। कई बार मैंने देखा कि एक छोटी सी बच्ची आती है और किसी आइटम गर्ल की मूवमेंट करती है। मैं तो तुरंत वहीं टोक देता हूं कि यार ये इस बच्ची से क्या करवा रहे हो? इसका बचपना मत छीनो। 

हिंदी सिनेमा में आपने  लम्बा समय दिया है। कभी लगा कि यहाँ जो मुकाम आपका होना चाहिए था वो नहीं मिला ? 
- मैं बहुत कुछ कर सकता था, अभी भी काफी कर सकता हूं। लेकिन मुझे मौके नहीं मिले। इस फिल्म इंडस्ट्री में ९५ प्रतिशत किस्मत का सिक्का चलता है। सलमान खान की पहली फिल्म नहीं चली, लेकिन 'मैंने प्यार कियाÓ के हिट होने के बाद उनकी निकल पड़ी।अजय देवगन को देखकर कइयों ने कहा अरे यार ये हीरो के रूप में नहीं चलेगा।लेकिन उनकी फिल्म हिट हो गयी और वो आज कहां है ये सभी देख रहे हैं। हमारे देश में कई बहुत अच्छे कलाकार हैं, लेकिन उनकी किस्मत उनके साथ नहीं है, तो वो गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं। 'शोले' चल गई तो लोग शम्भा को भी जान गये। 

आपने कॉमेडी, मिमिक्री और स्टेज शो सहित क्षेत्रों में काम किया। आपके लिए आसान क्या है ? 
-मैं अपने आपको एंटरटेनर मानता हूं। आप मेरी फिल्मे देखकर मेरी रेंज जान जाएंगे। मुझे किसी भी रोल में डाल दीजिए मैं उसमें ढल जाऊंगा। मेरा अपने काम को लेकर एक कॉन्फिडेंस है, ओवर कॉन्फिडेंस नहीं। फिल्म चली ना चली, लेकिन मेरे काम पर किसी ने उंगली नहीं उठायी। 

आज की फिल्मों में बदलाव क्या देख रहे हैं ?
-हमारी फिल्में पहले सर्कस की तरह थी। जैसे एक जोकर, एक लड़का, एक लड़की, एक विलेन, एक घोड़ा एक फार्मूले की तरह आते थे। लेकिन आज फिल्मे कहानी के अनुसार चलने लगी हैं। पहले कॉमेडी अलग होती थी, परंतु आज कहानी का हिस्सा बनकर आ रही है। दूसरे आज विकी डोनर और मसान जैसी फिल्में चल रही हैं। लेकिन अभी हमारे यहां इनके लिए मार्केट नहीं बन पाया है। इसका कारण भी है। फिल्म एंटरटेनमेंट का माध्यम है। सबके रोजमर्रा की जिंदगी में समस्याएं हैं, हर जगह तनाव है। लोग इससे बचकर फिल्म में एक खूबसूरत मायावी दुनिया देखने जाते हैं, जिसमें थोड़ी देर के लिए वो अपना गम छोड़कर उसी में खो जाते हैं। अगर फिल्म में भी वही भूख और पीड़ा दिखे तो वो पैसे खर्ज कर क्यों देखें। वो तो आस-पास ही पड़ा है। 

आपका राजनीति में जाना क्या भावनाओं का क्षणिक आवेग था या अब भी जा सकते हैं ?
-मुझे लगा कि एक आदमी सच्चाई के साथ सांप्रदायिकता के खिलाफ आवाज उठा रहा है, तो मुझे उसका साथ देना चाहिए इस लिए चुनाव लड़ गया। वहां मेरा मुकाबला भाजपा के राजनाथ सिंह, कांग्रेस की रीता बहुगुणा और सपा एवं बसपा जैसी मजबूत पार्टियों से रहा। ऐेसे में मुझे जितने वोट मिले वो काफी मायने रखते हैं। क्योंकि एक तो मैं वहां अचानक गया था, दूसरे मेरी पार्टी भी नयी थी। अब मैं सीधे राजनीति में नहीं जाने वाला हूं। हां एक सपोर्टर के रूप में रहूंगा।    

Tuesday, October 20, 2015

बहाने पुकारे भइया ...

बहाने पुकारे भइया 
ले लूँ तेरी बलइया 
अपने हाथ 
चाहे जहाँ तू जाए 
वहां मेरी दुआएं 
होंगी साथ 
ज्योति फैलाये सूरज जब तक गगन से 
उतनी उमर तेरी माँगू किशन से 
सूरज पर ग्रहण आये 
तुझ पर वो भी न आये 
कोई घात
जीवन में हर पल ख़ुशी महक हो 
माथे चमकता विजय का तिलक हो 
प्रभु से विनती है मेरी 
कीर्ति हो जग में तेरी 
रातों रात  

Sunday, October 11, 2015

अब लोगों पर अंधविश्वासी की तरह भरोसा नहीं करती : ऋचा चड्ढा



क्या अब आपका संघर्ष खत्म हो गया है ?
- संषर्ष तो अब भी चल रहा है। बस उसका रूप बदल गया है।  पहले ऑटो से संघर्ष कर रही थी और अब अपनी गाड़ी से करती हूं। पहले फिल्म पाने के लिए भाग दौड़ कर रही थी, अब अपने काम को नया आयाम देने में श्रम लगा रही हूं। फिल्म इंडस्ट्री में होना मतलब लाइफ टाइम के लिए संघर्ष में होना है। इसलिए ऐसा नहीं कह सकती कि कुछ फिल्मों की सफलता और प्रशंसा के बाद मेरा संघर्ष खत्म हो गया है। यहां हर फ्राइडे के बाद करियर का भविष्य निर्धारित होता है।

आपकी पहचान टुकड़ों में हुई है। बीच के समय में हौसला कैसे बनाए रखा ?
- 'ओए लकी  लकी ओए' और 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' के बीच चार साल का गैप है। उसमें २००८ से २०१० तक का समय मेरे लिए काफी मुश्किलों भरा रहा। मेरे पास कोई काम नहीं था। उस दौरान मैंने अपने अंदर के कलाकार को जिंदा रखने के लिए थियेटर किये, नाटक किये। किसी काम को पाने का हौसला बनाये रखने के लिए सबसे जरूरी है कि उसमें आपकी रुचि लगातार बनी रहे। इसके अलावा आपकी हॉबिज और आपसे जुड़े लोगों की भी भूमिका महत्वपूर्ण होती है, जिससे आप निराशा में जाने से बच जाते हैं। मेरे मुश्किल दिनों में मेरे परिजनों का बड़ा सहयोग रहा। पैसे कम होने पर पैसे भेजे, मुझसे बातचीत में उन्हें कभी लगता था कि मैं  कुछ निराश हूं, तो वो मुंबई आ जाते थे।

'मैं और चाल्र्स' कैसी फिल्म है ?
- ये एक थ्रिलर फिल्म है। क्रिमिनल चाल्र्स की कहानी है कि कैसे वो लॉ स्टूडेंट मीरा की मदद से दो- चार कैदियों के साथ देश की सबसे सुरक्षित जेल तिहाड़ से भाग जाता है। उसके बाद पुलिसकर्मी अमोल चाल्र्स की जिंदगी में भाग दौड़ शुरू करता है। चाल्र्स गोवा में पकड़ा जाता है और फिर मुंबई में उसका सामना अमोल से होता है। इसमें यही दिखाया गया है कि कैसे घटनाओं की प्लाटिंग और उन्हें अनकवर किया गया है। मैं मीरा बनी हूं और चाल्र्स का किरदार रणदीप हुड्डा निभा रहे हैं।

ग्लैमर इंडस्ट्री में होकर भी ग्लैमरस हीरोइन की पहचान ना होने को लेकर कभी कसक होती है ?
- हां, कभी-कभी ये कसक उठती है। इसकी वजह ये है कि ग्लैमरस रोल की फिल्में करने के कारण आपके पास कमाई करने के कई रास्ते आ जाते हैं। कई शोज, अपियरेंस के मौके मिलते हैं। ऐसा नहीं है कि मैं ग्लैमरस रोल की फिल्में बिल्कुल ही नहीं कर रही हूं। लेकिन उसको लेकर बहुत बेचैन नहीं हुई जा रही हूं। 'मसान' की सफलता के बाद कई लोगों ने मुझसे पूछा कि आप बड़े बजट की कमर्शियल फिल्में क्योंनहीं करतीं। मैं उन सभी से कहना चाहती हूं कि 'मसान' जैसी मीनिंगफुल अच्छी फिल्में और करना चाहूंगी।

जब पहली बार अभिनेत्री बनने का ख्याल आया, तो क्यावो ग्लैमर का आकर्षण था ?
- बचपन से ही मुझे लग रहा था कि मैं अभिनेत्री बनने के लिए ही बनी हूं। मेरे मन में आकर्षण ग्लैमर को लेकर ना होकर सिनेमा को लेकर था कि वो कौन सी बात है, जो बनावटी होते हुए भी इतना असरदायी है। ये बच्चे से लेकर बड़े तक सभी जानते हैं कि जो पर्दे पर दिख रहा है, वह बनाया हुआ है। फिर भी सभी उससे जुड़ जाते हैं।


फिल्म इंडस्ट्री में कभी ठगे जाने का अहसास हुआ ?
— हां, ये अहसास कई तरह के हैं। जैसे कुछ लोगों ने कोई काम देने का भरोसा देकर लटकाए रखा, लेकिन वो कोरा आश्वासन ही साबित हुआ। स्ट्रगल के दिनों में ऐसे कटु अनुभन होते रहते हैं। लेकिन यही अहसास हमें परिपक्व बनाते हैं।
अब मैं लोगों पर अंधविश्वासी की तरह भरोसा नहीं करती हूं।

   

Friday, October 2, 2015

हमारा समाज भगोड़ा है : लव रंजन



2011 में आई फिल्म 'प्यार का पंचनामा' के जरिये लड़का -लड़की के आधुनिक संबंधों को लेकर एक नयी बहस की शुरुआत करने वाले निर्देशक लव रंजन 'प्यार का पंचनामा २' लेकर आ रहे हैं।  फिल्म के प्रमोशन के दौरान हुई मुलाकात में उन्होंने फिल्म और समाज सहित कई मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखी।  प्रस्तुत है प्रमुख अंश -  

सबसे महत्वपूर्ण बात क्या है जिसके लिए 'प्यार का पंचनामा २' देखनी चाहिए ?
- 'प्यार का पंचनाम' की खासियत यह है कि ये वो बात कहती है, जो कोई और नहीं कहता। आदमी औरतों को कैसे परेशान करता है, इस पर कई फिल्में बनी हैं। लेकिन महिलाएं किस तरह पुरुषों को तंग करती हैं इसे केवल 'प्यार का पंचनामा' दिखाती है। 'प्यार का पंचनामा २' पहले से ज्यादा मजेदार है। मैंने इसे बहुत संजीदगी के बजाय मजाक में दिखाया है कि भाई देखो ऐसा भी होता है। इसके किरदार लोगों को कनेक्ट करेंगे। फिल्म की घटनाएं देखकर हर एक को लगेगा कि हां यार मेरे साथ या मेरे दोस्त के साथ ऐसा ही हुआ है। मेरा दावा है कि आप हंसते रहेंगे और आपको पता नहीं चलेगा कि फिल्म कब खत्म हो गयी। आपकी कोई दोस्त होगी या बीवी होगी तो यह फिल्म दिखाकर यह बताने का मौका मिल जाएगा कि देखो ये कई सारे बातें हैं, जो मैं तुमसे नहीं कह पाता था। अब समझ भी जाओ और मुझे हैरान-परेशान करना छोड़ दो।

'प्यार का पंचनामा'  आने के बाद आपको महिला विरोधी कहा गया। कुछ कहना चाहेंगे ?
- माफी के साथ कहना चाहूंगा कि हमारा समाज जो है, वो एक भगोड़ा किस्म का समाज है। इससे ज्यादा भगोड़ा मैंने दुनिया में कहीं नहीं देखा। यह समाज किसी चुनौती पर बहस करने को तैयार होने के बजायअपनी सुविधानुसार रास्ता पकड़ निकल पड़ता है। मैंने एक बहस की शुरुआत की। मेरी दूसरी फिल्म 'आकाशवाणी' किसी ने नहीं देखी। वो तो पूरी तरह से लड़कियों के ऊपर थी कि पढ़ी-लिखी लड़कियां भी किस तरह मां-बाप के कहनेपर शादी कर लेती हैं। तब तो मुझे किसी ने फेमिनिस्ट, लड़कियों का शुभ चिंतक नहीं कहा। देखिये कोई भी फिल्मकार कल्पना से फिल्में बनाता है। ये उसका रचना पक्ष होता है। उसे किसी के निजी व्यक्तित्व से जोडऩा मैं सही नहीं मानता। मैं ऐसी बातों से विचलित नहीं होता। जो बातें पीढिय़ों से चली आ रही हैं, उसे टूटने में समय लगेगा। जैसे तराजू के एक पलड़े में कुछ पहले से रखा है और दूसरे को भी बराबर करने के लिए हम उसमें कुछ रखते हैं, तो वो एकाएक बराबर नहीं हो जाता। पहले वो झूलता है। मैं आशान्वित हू कि एक दिन ऐसा समय आएगा। क्योंकि समानता तो होनी ही चाहिए। 

'प्यार का पंचनामा'  से पार्ट २ में समानता और भिन्नता क्या है ?
- समानता सुर की है, आत्मा की है और मुद्दे की है। तीनों किरदार नये हैं और उनकी कहानियां भी अलग हैं। 'प्यार का पंचनामा' के मध्यांतर बाद मैं कुछ ज्यादा संजीदा हो गया था। लेकिन इस बार मैंने थोड़े हल्के तरीके सेमनोरंजक रूप से बातें कही है। ताकि किसी को कुछ चुभे नहीं। मैंने हंसते-हंसते सारी बातें कहने की कोशिश की है।

 पार्ट १ की बड़ी सफलता आज आपके लिए दबाव है या चुनौती ?
- उम्मीद है। उसका कारण है कि पार्ट वन जब आया था, तब कोई न तो मुझे जानता था और न ही उस फिल्म को। 'प्यार का पंचनामा' के रिलीज के बाद तुरंत लोग देखने भी नहीं आये। देखकर आये लोगों ने औरों के इसके बारे में बताया तब फिल्म लंबे समय तक थियेटरों में लगी रहकर हिट हुई। लेकिन इस बार लोग मुझे और 'प्यार का पंचनामा २' दोनों के बारे में जान गये हैं। लोगों में इसको लेकर उत्साह है, तो मैं यही कहूंगा कि मुझे उम्मीद है कि दर्शक ये फिल्म देखने जरूर आएंगे।
चार साल बाद 'प्यार का पंचनामा' का सिक्वल बनाने का कारण सफलता को लेकर कोई रिस्क से बचना तो नहीं रहा ? क्योंकि आप एक मजबूत आधार पर चल रहे हैं...
- ये बात पहले से ही थी। बस हमारा स्टैंड ये था कि हम बैक टु बैक नहीं बनाना चाहते थे। हम बीच में कुछ और बनाना चाहते थे।  इसमें चार क्यापांच साल भी लग सकते थे। फिल्म लाइन में सब कुछ आपके हाथ में नहीं होता। कई कारणों से काम लटक जाता है। सबसे जरूरी बात आपके पास स्क्रिप्ट होनी चाहिए और स्क्रिप्ट के बारे तो कोई निश्चित फार्मूला नहीं होता। यह ३० दिन में भी पूरा हो जाएगा और ६ महीने भी लग सकते हैं। ऐसे में जब तक आपके हाथ में पूरी तरह से तैयार स्क्रिप्ट नहीं आ जाती आप फिल्म बनाने के बारे में कैसे सोच सकते हैं। यही तो मुख्य आधार है। 

पार्ट वन की सफलता में उसके संवादों का बड़ा योगदान रहा। आप संवादों से दर्शकों को बांधने में ज्यादा यकीन करते हैं या सिचुएशन से प्रभावित करने में ?
- मेरा मानना है कि अगर आप दोनों में से किसी पर कम और ज्यादा ध्यान रखते हैं, तो आप फिल्म के साथ न्याय नहीं कर पाएंगे। यदि मैं सिर्फ संवादों से दर्शक को बांधने की कोशिश करुंगा, तो हो सकता है उन्हें हंसी आ जाए, लेकिन उससे असरदायी मनोरंजन नहीं हो सकता। आपको मजा संवादों से आता है, लेकिन कनेक्टिविटी सिचुएशन और किरदारों से आती है। इस लिए जैसे दर्शक को बांधने के लिए अच्छे संवाद की जरूरत है, उसी तरह उन्हें प्रभावित करने के लिए सिचुएशन भी महत्वपूर्ण है। अपवाद स्वरूप ऐसा हो जाता है कि अच्छी सिचुएशन औसत संवाद को संभाल लेती है और कभी संवाद इतने सटीक होते हैं कि अपनी रवानी में दर्शकों को बहा ले जाते हैं, जिससे सिचुएशन की कमी छिप जाती है।

आपकी सभी फिल्मों में कार्तिक और नुशरत रहे हैं। इन पर इतना भरोसा का कारण क्या है ?
- 'प्यार का पंचनामा' में तो ये दोनों भी अन्य छह कलाकारों की तरह मेरे कास्टिंग डायरेक्टर के जरिये आये थे। फिर उसके बाद इनके साथ एक कम्फर्ट लेबल आ गया। दोनों ही मेहनती और अच्छे कलाकार हैं। दोनों वक्त देने के लिए तैयार रहते हैं। मेरे लिए कमिटमेंट बहुत मायने रखता है। जो आप मेरे लिए वक्त दिये हैं, मै चाहता हूं कि बीच में आप उसमें कोई व्यवधान न डालें। टालमटोली या कामचोरी के बीच काम करना मेरे लिए मुश्किल हो जाएगा। सिर्फ ये ही नहीं बल्कि मेरे कैमरामैन, संगीतकार, एडिटर और कोरियाग्राफर भी नहीं बदले हैं। 

और प्रोड्यूसर भी । कैसा रिश्ता है उनके साथ ?
- सात साल पहले की बात है मैं और अभिषेक दोनों यंग थे। दोनों न्यूयार्क से लौटे थे। हमारी पहचान एक दोस्त की शादी में हुई थी। जहां तक रिश्ते की बात है, प्रोड्यूसर-डायरेक्टर की वही जोड़ी अच्छी हो सकती है जो लड़ाइयां झेल ले। हममें अब भी लड़ाई होती हैं, बस प्रकृति बदल गयी है। आज हम दोनों एक दूसरे की कमियां और खूबियां जानते हैं और उसी रूप में एक दूसरे को स्वीकार कर चुके हैं। काम के प्रतिईमानदारी दोनों की सेम है। बतौर प्रोड्यूसर अभिषेक पैसा कमाना चाहता है, लेकिन अच्छी फिल्म बनाकर और मैं एक ऐसी अच्छी फिल्म बनाना चाहता हूं, जो पैसा भी कमाये। अभिषेक की एक अच्छी बात बताऊं, कई बार इसके मना करने के बाद भी मैंने वो काम किया और गलत साबित हो गया। लेकिन ये बाद में मुझे ये जताने नहीं आया। तो इससे एक सम्मान और विश्वास का रिश्ता कायम हो जाता है। 

आज आप जो हैं, उसकी बुनियाद कब पड़ी ?
-(हंसते हुए) १९८१ में जब मैं पैदा हुआ। नौवीं कक्षा में था, जब राइटिंग में रुचि हुई और कविता, शेर लिखने की कोशिश करने लगा। मेरी मां भी डॉक्ट्रेट की हैं तो इस दिशा में घर में ही माहौल मिल गया और सपोर्ट भी मिलता रहा। दूसरे मैं फिल्में भी बहुत देखता था। शायद उसका भी असर है। 

Saturday, August 22, 2015

जज्बे से भरपूर प्यार के सामुदायीकरण की फिल्म 'मांझी द माउंटेन मैन'

बिहार के गया जिले के दलित दशरथ मांझी के रुहानी प्रेम की सच्ची घटना से प्रेरित 'मांझी द माउंटेन मैन' प्यार और जज्बे की ऐसी कहानी है, जिसमें व्यक्तिगत के साथ-साथ सामुदायिकता का भाव समाहित है। दशरथ की गर्भवती पत्नी फल्गुनिया पानी लाते पहाड़ से फिसलकर गिर गयी थी। उसके गहलोर गांव से वजीरगंज अस्पताल पहुंचे में पहाड़ होने सेहुई देरी के कारण फल्गुनिया की मौत हो जाती है। ऐसा किसी और के साथ न हो इसलिए दशरथ ने पत्नी को याद करते २२ सालों तक लगातार अकेले पहाड़ काट कर रास्ता बना दिया था।  निर्देशक केतन मेहता के लिए निश्चित रूप से दशरथ मांझी के पहाड़ तोड़ रास्ते बनाने के भागीरथी प्रयास और दिवंगत पत्नी को समर्पित प्रेरणा को एक स्क्रिप्ट का रूप देना काफी मुश्किल रहा होगा। मध्यांतर से पहले इसकी झलक भी दिखती है, लेकिन मध्यांतर के बाद फिल्म एक सूत्र में बंध जाती है। किसी क्षेत्र विशेष की सच्ची घटना को राष्ट्रीय स्तर पर दिखाने में दो प्रमुख समस्याएं आती हैं। एक वातारवरण की और दूसरी भाषा की। वातावरण की समस्या तो संबंधित स्थल पर जाने से हल हो जाती है, लेकिन भाषा की समस्या अंत तक खतरा बनी रहती है। निर्देशक यदि वही भाषा पकड़ता है, तो राष्ट्रीय स्तर पर संप्रेषण में बाधा आएगी और अगर छोड़ता है, तो वातावरण से सामंजस्य कैसे बैठेगा। इस खतरे से '
मांझी..' भी नहीं बच पायी है। केतन मेहता ने पूरी शूटिंग उसी घटना स्थल पर करके पर्दे पर सच्चाई का आभास तो करा दिया। लेकिन भाषा असंगत रह गयी।
'मांझी...' पूरी तरह से दशरथ मांझी के किरदान में नवाजुद्दीन सिद्दीकी की फिल्म है। पहले सीन में ही पहाड़ के समक्ष पत्नी के विरह में दशरथ की हृदयविदारक ललकार चौंकन्ना कर देती है। अपनी धुन के पक्के एक मूडी युवा प्रेमी से लेकर संवेदनशील बुजुर्गावस्था तक की दशरथ मांझी की जीवटता के टेंपो को नवाजुद्दीन ने पर्दे पर बरकरार रखा है। फल्गुनिया के रोल मेंराधिका आप्टे उस आदिवासी क्षेत्र की आबो हवा में घुलमिल सी गयी हैं। कथा विस्तार में फिल्म जमींदारी प्रथा और छूआछूत जैसे तत्कालीन सामाजिक मुद्दों को भी छूते हुए निकलती है। इसके लिए पात्रों का चयन भी सार्थक साबित हुआ है। लेकिन दशरथ मांझी के पूरे अभियान के बीच कई बार शाहजहां और ताज महल का जिक्र खटकता है। क्याआप मांझी के कामको शाहजहां का अनुकरण दिखाना चाहते हैं? अगर इन दोनों के कार्यों का विश्लेषण किया जाए, तो दशरथ मांझी का प्रेम कहीं ज्यादा पवित्र और सार्वभौमिक है। उसने अपने प्रेम का सामुदायीकरण कर दिया है। दूसरे ताज महल को हजारों कारीगरों ने बनाया था, जबकि दशरथ ने २२ साल में यह रास्ता अकेले बनाया था, जिसे बाद बिहार सरकार ने ३० साल में सड़क में परिवर्तित कर उसका नाम 'दशरथ मांझी पथÓ रखा।

स्टार : तीन