Monday, January 13, 2014

हर युग में बेगम पारो

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अभिषेक चौबे निर्देशित फिल्म 'डेढ़ इश्किया' २०१० की 'इश्किया' का सीक्वल होते हुए भी कथानक की दृष्टि से एक पूर्ण फिल्म लगती है। अगर बारीकी से देखें, तो फिल्म की थीम है 'अपने नजरिये से अपना मूल्यांकन।' इसी की छटपटाहट दो पात्रों इफ्तेखार(नसरुद्दीन शाह) और बेगम पारो (माधुरी दीक्षित नेने)में दिखती है। नृत्य और गायन की शौकीन बेगम पारो जुआ और शराब की लत वाले स्त्री से बेपरवाह पति, जो सारी सम्पत्ति गिरवी रख गया है, के निधन के बाद अपनी आजादी की जद्दोजहद करती है। यदि बेगम पारो के पूरे जीवन का विहंगावलोकन किया जाय, तो कई परतें खुलती जाएंगी और हर परत में एक पीड़ा दिखेगी, जिसकी मौजूदगी हर युग में दिखती रही है। वहीं अपनों के लिए जीते आ रहे इफ्तेखार की इच्छा अब अपने लिए की है। इफ्तेखार और बब्बन (अरशद वारसी) एक हार चोरी कर भागते अलग हो जाते हैं। इफ्तेखार नवाब का भेष बना महमूदाबाद की बेगम पारो के मुशायरे में शामिल होता है,जहां पारो को सर्वश्रेष्ठ शायर को अपना शौहर चुनना है। पारो के प्यार में दीवाना इफ्तेखार अपना भेद खुलने की भी परवाह नहीं करता, तो कभी मासूमियत में सच्चाई बताने की कोशिश भी करता है। जान मोहम्मद (विजय राज),जिसके यहां पारो की संपत्ति गिरवी पड़ी है, किसी भी कीमत पर पारो को पाना चाहता है। इफ्तेखार को ढंूढ़ते बब्बन महमूदाबाद पहुंचता है, यहां उसे पारो की विश्वासपात्र मुनिया (हुमा कुरेशी) से प्यार हो जाता है। फैसले के दिन पारो जान मोहम्मद को चुनती है और पूर्व नियोजित प्लान के तहत जान मोहम्मद से रुपये निकलवाने के लिए बब्बन के हाथों अपना अपहरण करवाती है। अंतत: आजाद हो पारो मुनिया के साथ अपनी पसंद की जिंदगी शुरू करती है। संवाद सटीक और चुटीले हैं, लेकिन कालखंड की दृष्टि से संक्रमित हैं। इफ्तखार और पारो के बीच के संवाद पात्र और समयानुकूल तहजीब भरे उर्दू में हैं, जिसे समझने में युवा पीढ़ी को परेशानी हो सकती है। शायद इसी को ध्यान में रखकर स्क्रीन पर नीचे संवादों के अंग्रेजी अनुवाद की पट्टी रखी गयी है। दूसरी तरफ मुनिया-बब्बन के बीच आधुनिक मोबाइल की भाषा, तो इफ्तखार-बब्बर में टपोरी की भाषा का प्रयोग दिखता है। फिल्म में अभिनय का हिस्सा पूरे १०० अंक मांगता है। नसरुद्दीन शाह, माधुरी दीक्षित, अरशद वारसी, हुमा कुरैशी और विजय राज ने पात्र और अदाकारी को एकाकार कर दिया है। थियेटर से बाहर निकलने के बाद भी सभी कलाकार दर्शकों के दिमाग में मौजूद रहेंगे। गाने भी अच्छे हैं। मध्यांतर से पहले फिल्म कुछ धीमी लगती है, जिससे कुछ समय के लिए दर्शकों पर पकड़ कमजोर पड़ती है, किंतु बाद के घटनाक्रम की तेजी काफी उत्सुकता जगाती है। बब्बन के व्यक्तित्व में विरोधाभास दिखता है, क्योंकि वह जिस कार्य के लिए पश्चाताप की भाषा बोल रहा है, वही कार्य उसे पहले करते हुए दिखाया जा चुका रहता है। 
                                                                                                                       -अश्वनी राय  स्टार : साढ़े तीन