Saturday, March 9, 2013

बोया पेड़ बबूल का....?

प्रातःकाल दैनिक में प्रकाशित मेरा यह समसामयिक लेख

प्रातःकाल दैनिक में प्रकाशित मेरा यह समसामयिक लेख

Saturday, February 16, 2013

क्या स्व'छ दिखता किचन कीटाणुमुक्त भी है ?

 क्या आपका साफ सुथरा दिख रहा किचन स्वास्थ्य की दृष्टि से भी स्व'छ है ? बिल्कुल नहीं, आपका किचन केवल ऊपरी तौर पर साफ है, ना कि पूरी तरह से कीटाणुओं से मुक्त। यह खुलासा 12 फरवरी को मुंबई में आयोजित 'किचन की सफाई और स्वास्थ्य अध्ययनÓ विषयक प्रेस कांफ्रेंस में इंडियन मेडिकल अकादमी ने किया।
अकादमी के 500 डॉक्टरों ने मुंबई, दिल्ली, चेन्नई, कोलकता, बंगलौर, हैदराबाद और पुणे में सर्वेक्षण कर पाया कि 87 प्रतिशत गृहिणियों ने केवल गंदगी, धूल, घी और तेल की सफाई को ही पर्याप्त माना, जबकि 90 प्रतिशत ने प्रत्यक्ष रूप से दिख रहे साफ किचन को ही स्वास्थ्य की दृष्टि से भी स्व'छ माना। केवल 13 प्रतिशत ने महसूस किया कि किचन से कीटाणु और जीवाणुओं की सफाई महत्वपूर्ण है । इसके विपरीत 100 प्रतिशत डॉक्टरोंने किचन में प्रत्यक्ष दिख रही सफाई को अल्प स्व'छता ठहराते हुए स्वास्थ्य विज्ञान की दृष्टि से अस्व'छ बताया । बकौल डॉक्टर प्रीतैश कौल (सलाहकार इंडियन मेडिकल अकादमी ), '' आम भारतीयों के बीच रसोई घर की सफाई के संदर्भमेंप्राथमिकता विभिन्न प्रकार की बीमारियां उत्पन्न करने वाले कीटाणुओं से मुक्ति पाने के बजाय प्रत्यक्ष दिखती सफाई से जुड़ी है ।ÓÓ
इसके अलावा बाथरूम की सफाई 2 प्रतिशतने दैनिक, 18 प्रतिशतने द्विसप्ताहिक, 36 प्रतिशतने सप्ताहिक, 40 प्रतिशतने पाक्षिक और 4 प्रतिशतने मासिक अंतराल पर करना बताया । जबकि रसोई घर की सफाई के संदर्भ में 0 प्रतिशतदैनिक, 0 प्रतिशतद्विसप्ताहिक, 1 प्रतिशतसप्ताहिक, 8 प्रतिशतपाक्षिक और 14 प्रतिशतने माना कि मासिक आधार पर की जानी चाहिए। गौरतलब है कि सर्वेक्षण में लिविंग रूम और बेडरूम की सफाई की आवृत्ति सबसे ज्यादा पायी गयी, उनका मानना था कि यह क्षेत्र अधिक निरीक्षण वाला होता है ।
जनरल मेडिकल के एम.डी. डॉ. वेंक्टेश्वर कहते हैं कि काफी संख्या में लोग यह मानते हैं कि बाहर खाने से आंतों के संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। उनमें कुछ तथ्य यह भी है कि यदि स्वयं के खाना पकाने के स्थान को कीटाणुमुक्त नहीं किया गया, तो अपना किचन भी अस्वस्थता का कारण बन सकता है। सर्वेक्षण से यह भी पता चला है कि किचन से जुड़े उपकरणों की तुलना में बेसिन, मोरी आदि की सफाई कम की जाती है। इसके अलावा अधिकांश भारतीय बर्तन, किचेन स्लैब्स, टावेल आदि की सफाई के लिए डिटर्जेंट पावडर, बार्स, लिक्विड और सादे पानी का उपयोग करते हैं, लेकिन जीवाणुरोधी प्रयोगकर्ताओं का अनुपात केवल 5प्रतिशत से 8 प्रतिशत के बीच है। जबकि डाक्टरों ने जीवाणुरोधी बार और लिक्विड का प्रयोग करने का सलाह दिया है । सर्वे में डॉक्टरों ने बताया है कि बर्तन साफ करने के लिए प्रयुक्त होने वाला कपड़ा यदि अ'छी तरह से विसंक्रमित नहीं है, तो बर्तन भी दूषित हो जाएंगे । सर्वे दल के डॉक्टरों ने संक्रमण फैलाव के प्रमुख कारणों में किचन और उससे संबंधित उपकरणों सहित अस्व'छ हाथ और दूषित कपड़ों के प्रयोग को बताया है।

Tuesday, July 31, 2012

भाड़ में जाय विश्व स्तरीय सुविधा, यात्रियों को पहले सुरक्षा चाहिए

भाड़ में जाय विश्व स्तरीय सुविधा 
यात्रियों को पहले सुरक्षा चाहिए
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नई दिल्ली से चेन्नई जा रही तमिलनाडु एक्सप्रेस के स्लीपर बोगी में लगी आग ने एक बार फिर भारतीय रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी । रेलवे प्रशासन रेल यात्रियों की सुरक्षा की दिशा में अपने प्रयासों के चाहे कितने भी दावे करे, लेकिन व्यवहारिक रूप से वे कितने अमल में लाये जा रहे हैं, इसकी वास्तविकता से हर रेल यात्री अच्छी तरह परिचित है । तमिलनाडु एक्सप्रेस में आग की शुरुआत का स्थान और समय टॉयलेट के पास सुबह ४.३० बजे बताया जा रहा है । आग का कारण शार्ट सर्किट हो या कुछ और, लेकिन एक गौरतलब बात यह है कि सुबह के समय अवैध रूप से ट्रेनों में लोकल चाय बेचने वालों की संख्या काफी बढ़ जाती है। ट्रेन में आग या ज्वलनशील पदार्थों पर रोक के बावजूद ये चाय गर्म करने के लिए सिगड़ी या टीन वगैर के घुमावदार चुल्हे में कोयला जलाकर रखते हैं और अक्सर दो बोगियों के बीच के  जुड़ाव की जगह पर चाय गर्म करते दिखाई देते हैं । यदि कोई यात्री इसका विरोध करता है, तो लडऩे पर भी उतारू हो जाते हैं । क्यायह रेलवे या जीआरपी की तरफ से तैनात सुरक्षा कर्मियों को दिखाई नहीं देता ? $ क्या यह उनकी इच्छा के बिना संभव  है ? 
भारतीय संसद में  रेल बजट प्रस्तुत करने के दौरान रेल मंत्री रेलवे से संबंधित विभिन्न क्षेत्रों में विश्व स्तरीय सुविधाआों के प्रस्तावों का जिक्र करते हैं । लेकिन इन आश्वासनों से क्या फायदा, जब रेल यात्रियों की सुरक्षा राम भरोसे हो । कहावत है-जान बची तो लाखों पाय । हर हादसे के बाद रेलवे की तरफ से मुआवजे की घोषणा की जाती है, इस बार भी हुआ । माना कि मुआवजा के रूप में मृतकों के परिजनों को दिये पांच लाख रुपये की आर्थिक सहायता कुछ समय के लिए उनकी रोटी को समस्या को टाल सकती है । परंतु यह कदम पारिवारिक सदस्य की क्षति पूर्ति नहीं कर सकता । इस लिए बेहतर तो यह है कि रेलवे पूर्व घटनाओं से सीख लेकर किसी भी तरह की सभी संभावित आशंकाओं के मद्देनजर सुरक्षा के व्यापक बंदोबस्त करे । यात्री विश्व स्तरीय सुविधा से पहले विश्व स्तरीय सुरक्षा ज्यादा पसंद करेंगे ।  
आज लोकल हो या एक्सप्रेस सभी तरह की रेल गाडिय़ों में फेरीवालों का जमघट लगा हुआ है । इन फेरीवालों के कारण होने वाली परेशानियों से मुक्त होने की उम्मीद छोड़ यात्री इनके साथ सामंजस्य बिठाने को विवश हैं । गाडिय़ों में रुपये मांगते किन्नरों की हरकतों से परिवार के साथ यात्रा करते शर्मसार होने की स्थिति से लगभग हर कोई कभी ना कभी गुजरा ही होगा। ना जाने कब इन समस्याओं से यात्रियों को मुक्ति मिलेगी ।

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Thursday, July 26, 2012

उम्मीद

उम्मीद की ज्योति जलाकर 
अब गम का अँधेरा हर लेंगे
सपनों को गले लगाकर
अब गम का अँधेरा हर लेंगे
जो हुआ नहीं है दुनिया में 
वो आज यहाँ हम कर देंगे
हिम्मत से भरी इन बाँहों से मुश्किल का बोझ हटा देंगे
नामुमकिन के शब्द को हम इस दुनिया से ही मिटा देंगे
आफत से नैन लड़ाकर 
हर क्षण में मौज मनाकर
कुदरत का नज़ारा कर लेंगे
लाख बुरी हो यादें जहाँ की हमको नहीं सुनना गुनना 
हमको तो बश इतना पता है मंजिल दर मंजिल चढ़ाना 
नफ़रत की आग बुझाकर 
उलफत की नाव चलाकर
 खुशियों से समंदर भर देंगे
जो हुआ नहीं है दुनिया में
वो आज यहाँ हम कर देंगे

अश्वनी कुमार राय

Wednesday, July 25, 2012

सीमित दायरे में भोजपुरी खलनायकों के बड़े कारनामें

सीमित दायरे में भोजपुरी खलनायकों के बड़े कारनामें
    फिल्म की कहानी पात्रों के लक्ष्य प्राप्ति के बीच आने वाले उलझाव और  टकराव के सहारे ही आगे बढ़ती है । उलझाव उत्पन्न करने वाले पात्र को ही खलनायक कहा जाता है । खलनायक फिल्म की कहानी में बदलती हुई घटनाओं के बीच प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पुल का काम करते हैं, जिससे  अलग-अलग होकर भी अगली घटना पहली घटना का परिणाम दिखती है । मोहन जी प्रसाद द्वारा निर्मित और रवि किशन -नगमा अभिनीत फिल्म च्पंडित जी बताई ना बियाह कब होईज् घटनाक्रमों में लंबे अन्तराल के बावजूद फिल्म के खलनायकी पक्ष के कारण ही दर्शकों को अंत तक बांधे रखने में सफल हो पाई । क्योंकि दर्शक भाई सहित रवि किशन और कुणाल सिंह पर खलनायक बृजेश त्रिपाठी के अत्याचारों के हिसाब की उम्मीद  लगाये बैठा रहता है । खलनायक का चरित्र चित्रण फिल्म की कहानी को धक्का देने के लिए ही किया जाता है । 
यदि फिल्मी कहानी को तीन भागों (प्रारंभ, मध्य और अन्त) में बांटकर देखा जाय तो मध्य भाग सबसे लम्बा और महत्वपूर्ण दिखाई देता है । यह भाग एक तरह से खलनायक के नाम रहता है, जिसमें उसी का अधिपत्य दिखाई देता है । उसकी कारस्तानियां नायक-नायिका के सामने एक के बाद एक परेशानियां उत्पन्न करती रहती हैं । फिल्म में खलनायक के अनैतिक -अमर्यादित कारनामें दर्शकों के मन में जिज्ञासा उत्पन्न करते हैं । उसकी हरकतें एक साथ कई स्तरों पर फिल्म में अहम भूमिका निभाती हैं। एक तरफ उसके अमानवीय व्यवहार से फिल्म की कहानी को बिना बोझिल हुए विस्तार मिलता है, तो दूसरी तरफ खलनायक के कुचक्रों से बाहर निकलने की जद्दोजहद करते नायक के प्रति दर्शकों का संवेदनात्मक जुड़ाव भी होता रहता है । ऐसे में नायक का चरित्र निर्माण भी होने लगता है । खलनायक द्वारा उत्पन्न की गई अनेक मुसीबतों का सामना करते समय नायक-नायिका के कार्य -व्यवहार एक आदर्श प्रस्तुत करते हैं । इस क्रम में नायक-नायिका दर्शकों के लिए  आम से खास बन जाते हैं ।
चूंकि भोजपुरी की संस्कृति ग्रामीण संस्कृति है। अत: इस भाषा की फिल्मों में ग्रामीण जीवन के सामाजिक और आर्थिक परिवेश की विभिन्न समस्याओं के मद्देनजर तानाशाह जमींदार और सूदखोर महाजन ही खलनायक के रूप में प्रस्तुत किये गये । अधिकांश भोजपुरी फिल्मों में थोड़े से हेरफेर के साथ खलनायकों के मिलते-जुलते किरदार ही मिलते हैं, जिससे दर्शकों को खल किरदारों की गतिविधि का अंदाजा आसानी से हो जाता है। ऐसे हालात में खलनायकों के सामने खुद को साबित करने की एक मुश्किल चुनौती खड़ी रहती है । भोजपुरी फिल्मों में कथानक ग्रामीण जीवन पर आधारित होने के कारण खलनायकी में ज्यादा प्रयोग की गुंजाइस नहीं रहती । यही कारण है कि खलनायक को प्रमुखता देते हुए यहां कभी कहानी नहीं लिखी गई, जिसके कारण भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में प्राण, अमजद खां, अमरीशपुरी और गुलशन ग्रोवर जैसा मुकाम कोई भोजपुरिया खलनायक नहीं बना पाया। भोजपुरी खलनायकों की हालत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आज भोजपुरी फिल्मों की बाढ़ आने के बाद भी भोजपुरी समाज में बृजेश त्रिपाठी, अवधेश मिश्रा और संजय पाण्डेय को लगातार अच्छे अभिनय के बावजूद उचित सम्मान नहीं मिल पाया है । इसका प्रमुख कारण खलनायकों का कमजोर चरित्र चित्रण ही है । भोजपुरी खलनायकों की गुमनाम जिंदगी के लिए काफी हद तक मीडिया भी जिम्मेदार है । क्योंकि कलाकारों की नाम सहित पहचान सबसे ज्यादा मीडिया के माध्यम से ही होती है। भोजपुरी क्षेत्र के हिन्दी अखबार एक तो भोजपुरी फिल्मों को बहुत कम जगह देते हैं, दूसरे वे केवल भोजपुरी फिल्मों के नायक-नायिका तक ही सीमित रहते हैं। भोजपुरी फिल्मों के खलनायकों को वे हमेशा अपने लिए अनुपयोगी ही समझते रहे हैं ।
किरदार के सीमित क्षेत्र और तमाम उपेक्षाओं के बाद भी भोजपुरिया खलनायक जब भी मौका मिला है अपने अभिनय का लोहा मनवाते रहे हैं। खलनायक द्वारा पूरी फिल्म की घटनाओं को एक धागे में पिरोने का स्पष्ट प्रमाण फिल्म च्प्रतिज्ञाज् में मिलता है । फिल्म में कुणाल सिंह , पवन सिंह और दिनेशलाल यादव निरहुआ की अलग-अलग बिखरी हुई कहानी फिल्म के खलनायक अवधेश मिश्रा की हतकतों के कारण ही एक दूसरे से जुड़ी कड़ी बन पाती है । च्देवरा बड़ा सतावेलाज् में जबर्दस्ती खलनायकों के लिए डाली गई सी लगती कहानी में भी अवधेश मिश्रा, बृजेश त्रिपाठी और संजय पाण्डेय अच्छा काम कर दिखाते हैं । फलस्वरूप यह फिल्म काफी अच्छा धन्धा करने में सफल हो पायी। राजकुमार आर. पाण्डेय निर्देशित फिल्म च्दीवानाज् अपनी महबूबा की राह देखते नायक की बेहद धीमी शुरुआत के साथ शुरू होती है । लेकिन फिल्म के खलनायक संजय पाण्डेय के सीन के साथ इस सुस्त कहानी को जोरदार धक्का लगता है और फिल्म दर्शकों को अपने साथ लिए तेजी से आगे बढऩे लगती है।
भोजपुरी फिल्मों के पहले दौर में परम्परा, परिस्थिति और चारित्रिक विशेषता को ही प्रमुखता देते हुए घटनाओं का ताना बाना बुना गया । यह क्रम आज वर्तमान समय में भी जारी है । फिल्म में खलनायक के बजाय नायक के चारित्रक पक्ष से कहानी में मोड़ लाने का एक अच्छा उदाहरण हमें उदित नारायण और दीपा नारायण की राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म च्कब होई गवना हमारज् में मिलता है। फिल्म के नायक रवि किशन की हीरो बनने की इच्छा ही कहानी में तनाव उत्पन्न करती है । इस फिल्म में छपरा के एक खुशहाल संपन्न परिवार का लड़का बृज भूषण (रवि किशन)माता- पिता से चुपके अपनी दादी से 10 लाख रुपये लेकर अपने गांव के साथी युवक के साथ भागकर हीरो बनने मुंबई चला जाता है । नायक का यही कदम कहानी को एक रोचक मोड़ देता है । क्या नायक अपनी मनोकामना पूरी करने में सफल हो पाता है? क्या उसके मायूस परिवार वालों का इंतजार खत्म होगा? इसी उत्सुकता में दर्शक फिल्म की रवानी में बहता रहता है । आज का भोजपुरिया समाज पहले से काफी परिवर्तित और ज्यादा विकसित है । ऐसे में भोजीवुड में अब ऐसे दक्ष लेखकों की जरूरत है, जो परंपरागत कहानियों से ऊपर उठकर च्शोलेज् के गब्बर सिंह और च्मिस्टर इंडियाज् के मोगेम्बो जैसे कुछ कालजयी पात्रों की रचना कर सकें। लेखक सलीम-जावेद की जोड़ी की रचनाधर्मिता का ही कमाल था कि अमजद खान और अमरीशपुरी द्वारा खलनायक के रूप में बोले गये संवाद और उनके लहजे का आज भी विज्ञापन सहित अन्य विधाओं में तरह-तरह से अनुकरण किया जा रहा है।         
                                        - अश्वनी  कुमार राय   

Monday, August 29, 2011

खुल के हंसना चाहती हूँ

खुल के हंसना चाहती हूँ 
मैं मुक्त होना चाहती हूँ 
स्त्री की तस्वीर वाले फ्रेम को 
कुछ सुधारना चाहती हूँ
रीति के लिबास पर तर्क का 
इस्त्री चलाना चाहती हूँ 
रोक टोक के बिना उड़ने को 
आकाश पाना चाहती हूँ
जाती रंग रूप से परे 
पहचान पाना चाहती हूँ 
खुल के हंसना चाहती हूँ 
मैं मुक्त होना चाहती हूँ