Thursday, March 6, 2014
Monday, February 24, 2014
फिल्म समीक्षा : हाइवे
हाईवे की समीक्षा लिखते अनिर्णय की स्थिति आ गई है कि पाठकों को घटना में लडख़ड़ाहट का हवाला दूं या हृदयविदारक सच्चाई से रू-ब-रू होने की सलाह। इम्तियाज अली निर्देशित यह फिल्म टुकड़ों में समाज के कईबेहद संवेदनशील व्यवहारिक पहलुओं को उजागर करती है। फिल्म का मुख्य तत्व अभिजात्य वर्ग के दिखावटी सभ्यता का खोखलापन है, जिससे परेशान होकर उस परिवार की लड़की घर से भागती है। लेकिन इस क्रम में इसका ताना बाना बिखर गया है। कुछ संवाद 'गागर में सागरÓ की उक्ति को चरितार्थ करते हैं। जैसे- 'जहां से तुम मुझे ले आये हो, वहां लौटना नहीं चाहती और जहां ले जाना चाहते हो, वहां पहुंचना नहीं चाहतीÓ, ' एक गोली दो जान लेती है। जिस पर चलती है और जिससे चलती है, दोनों कीÓ , 'अच्छे से बात करनाÓ अपने अंदर बहुत विस्तृत व्याख्या लिये हुए हैं।
अमीर एमके त्रिपाठी की बेटी वीरा त्रिपाठी (आलिया भट्ट)की शादी होने वाली है। शादी की तैयारियों के बीच खुली हवा में कुछ क्षण बिताने के लिए अपने मंगेतर से जिद कर रात को हाइवे पर निकलती है, जहां से महावीर भाटी (रणदीप हूड़ा)अपने गैंग के साथ उसका अपहरण कर लेता है। वीरा की पहचान जान अपहरणकर्ता उसके राजनीतिक-आर्थिक रूप से ताकतवर पिता से बचने के लिए एक जगह से दूसरी जगह भागता है। भौतिक सुविधाओं में रहने वाली वीरा को विशुद्ध प्रकृतिकी आबो हवा काफी रास आती है और वह इस सफर को लुत्फ के रूप में लेने लगती है। अपहरणकर्ता महावीर भाटी अब उसे हमराह नजर आता है। दूसरी तरफ महावीर की बेरूखी का बर्फ वीरा की निश्छलता से पिघलती है।
फिल्म खासकर लड़कियों के पालन-पोषण और उनकी सुरक्षा पर प्रकाश डालते यौन शोषण के मामलों के सबसे बड़े सुरक्षा कवच 'किसी से कुछ ना कहनाÓ को नंगा करती है। जब वीरा सबके सामने अपने ही चाचा द्वारा अपने यौन शोषण की व्यथा सुनाती है। 'हाइवेÓ का सबसे मजबूत पक्ष कलाकारों का अभिनय और इसकी सिनेमेटोग्राफी है। उन्मुक्तता और आक्रोश के मनोभावों को व्यक्त करतेआलिया भट्ट और हृदय परिवर्तन के दृश्यों में रणदीप हूड़ा काफी प्रभावित करते हैं। सिनेमेटोग्राफी इतनी सुंदर है कि फिल्म देखते स्क्रीन भी कुछ बड़ी लगने लगता है। गीत-संगीत विषय को गति देते हैं।
Monday, February 17, 2014
Monday, January 13, 2014
हर युग में बेगम पारो
![]() |
| www.pratahkal.com |
अभिषेक चौबे निर्देशित फिल्म 'डेढ़ इश्किया' २०१० की 'इश्किया' का सीक्वल होते हुए भी कथानक की दृष्टि से एक पूर्ण फिल्म लगती है। अगर बारीकी से देखें, तो फिल्म की थीम है 'अपने नजरिये से अपना मूल्यांकन।' इसी की छटपटाहट दो पात्रों इफ्तेखार(नसरुद्दीन शाह) और बेगम पारो (माधुरी दीक्षित नेने)में दिखती है। नृत्य और गायन की शौकीन बेगम पारो जुआ और शराब की लत वाले स्त्री से बेपरवाह पति, जो सारी सम्पत्ति गिरवी रख गया है, के निधन के बाद अपनी आजादी की जद्दोजहद करती है। यदि बेगम पारो के पूरे जीवन का विहंगावलोकन किया जाय, तो कई परतें खुलती जाएंगी और हर परत में एक पीड़ा दिखेगी, जिसकी मौजूदगी हर युग में दिखती रही है। वहीं अपनों के लिए जीते आ रहे इफ्तेखार की इच्छा अब अपने लिए की है। इफ्तेखार और बब्बन (अरशद वारसी) एक हार चोरी कर भागते अलग हो जाते हैं। इफ्तेखार नवाब का भेष बना महमूदाबाद की बेगम पारो के मुशायरे में शामिल होता है,जहां पारो को सर्वश्रेष्ठ शायर को अपना शौहर चुनना है। पारो के प्यार में दीवाना इफ्तेखार अपना भेद खुलने की भी परवाह नहीं करता, तो कभी मासूमियत में सच्चाई बताने की कोशिश भी करता है। जान मोहम्मद (विजय राज),जिसके यहां पारो की संपत्ति गिरवी पड़ी है, किसी भी कीमत पर पारो को पाना चाहता है। इफ्तेखार को ढंूढ़ते बब्बन महमूदाबाद पहुंचता है, यहां उसे पारो की विश्वासपात्र मुनिया (हुमा कुरेशी) से प्यार हो जाता है। फैसले के दिन पारो जान मोहम्मद को चुनती है और पूर्व नियोजित प्लान के तहत जान मोहम्मद से रुपये निकलवाने के लिए बब्बन के हाथों अपना अपहरण करवाती है। अंतत: आजाद हो पारो मुनिया के साथ अपनी पसंद की जिंदगी शुरू करती है। संवाद सटीक और चुटीले हैं, लेकिन कालखंड की दृष्टि से संक्रमित हैं। इफ्तखार और पारो के बीच के संवाद पात्र और समयानुकूल तहजीब भरे उर्दू में हैं, जिसे समझने में युवा पीढ़ी को परेशानी हो सकती है। शायद इसी को ध्यान में रखकर स्क्रीन पर नीचे संवादों के अंग्रेजी अनुवाद की पट्टी रखी गयी है। दूसरी तरफ मुनिया-बब्बन के बीच आधुनिक मोबाइल की भाषा, तो इफ्तखार-बब्बर में टपोरी की भाषा का प्रयोग दिखता है। फिल्म में अभिनय का हिस्सा पूरे १०० अंक मांगता है। नसरुद्दीन शाह, माधुरी दीक्षित, अरशद वारसी, हुमा कुरैशी और विजय राज ने पात्र और अदाकारी को एकाकार कर दिया है। थियेटर से बाहर निकलने के बाद भी सभी कलाकार दर्शकों के दिमाग में मौजूद रहेंगे। गाने भी अच्छे हैं। मध्यांतर से पहले फिल्म कुछ धीमी लगती है, जिससे कुछ समय के लिए दर्शकों पर पकड़ कमजोर पड़ती है, किंतु बाद के घटनाक्रम की तेजी काफी उत्सुकता जगाती है। बब्बन के व्यक्तित्व में विरोधाभास दिखता है, क्योंकि वह जिस कार्य के लिए पश्चाताप की भाषा बोल रहा है, वही कार्य उसे पहले करते हुए दिखाया जा चुका रहता है।
-अश्वनी राय स्टार : साढ़े तीन
Monday, December 23, 2013
फिल्म समीक्षा 'धूम ३'
फिल्म समीक्षा
'धूम ३' स्टार : साढ़े चार
अश्वनी राय
'धूम ३' का एक संवाद 'व्यक्ति कुछ को तोड़ता है, ताकि अपने अंदर कुछ टूटे हुए को जोड़ सके' पूरी फिल्म का सार इस एक वाक्य में व्यक्त कर देता है। फिल्म में सभी कलाकारों की इंट्री उनके चरित्रों के स्वभावानुसार लाजवाब तरीके से होती है। एक हृदयविदारक चीख के दृश्यांतर के साथ आमिर खान की इंट्री पर्दे के साथ-साथ दर्शकों के दिलो दिमाग में भी जगह बना लेती है।
कहानी 'द वेस्टर्न बैंक ऑफ शिकागो' के दुर्व्यवहार से आत्महत्या कर चुके इकबाल (जैकी श्राप)के बेटे साहिर (आमिर खान) द्वारा बैंक से बदला लेने की प्रक्रियाओं के साथ आगे बढ़ती है । साहिर बैंक लूटने के बाद वहां का सबकुछ अस्त-व्यस्त कर 'तेरी ऐसी की तैसी' लिख चला जाता है। लुटेरे के हिंदी में संदेश छोड़े जानेके कारण शिकागो पुलिस भारतीय पुलिस जय दीक्षित (अभिषेक बच्चन) और अली(आदित्य चोपड़ा)की सेवा लेती है। लेकिन प्रारंभिक असफलताओं से इन्हें इस मुहिम से बाहर कर दिया जाता है, जिसे जय अपनी इमेज के प्रति एक चुनौती के रूप में लेता है और अंतत: इन्हें सामने लाने में सफल होता हैं।
इत्ती सी कहानी के दर्शकों को पौने तीन घंटे तक बांधे रखने में सफल होने के राज हैं बेहतरीन पटकथा, रोमांचकारी एक्शन, रुला देने वाले इमोशन, मनमोहक लोकेशन, नयनाभिरामी सिनेमेटोग्राफी और शानदार अभिनय एवं निर्देशन।इस क्रम में फिल्म कभी दिलचस्प, तो कभी गंभीर पड़ावों से गुजरते हुए स्वप्न लोक से सर्कस में पहुंचती है, जहां आलिया (कैटरीना कैफ) और साहिर की अद्वितीय प्रस्तुति का जादू हरएक को अपना मुरीद बना देता है। फिल्म के अच्छे गानों में चार चांद लगाने का काम करता है आमिर और कैटरीना का डांस। संभव है कैटरीना को सबसे खूबसूरत लुक में दिखाये जाने वाली फिल्मों में 'धूम-३' का जिक्र किया जाये।
फिल्म का एक बेहद रोमांचक हिस्सा है रहस्यमयी बाइक, जो परिस्थिति के अनुसार अपना आकार और काम बदलती रहती है। यदि कुछ खिंचे से लगते भागती बाइक के सीन को थोड़ा छोटा कर कैटरीना संग रोमांस के सीन डाले गये होते तो शायद कुछ और अच्छा लगता । संवाद दिल को छूने वाले हैं। प्रारंभिग अंश के संवाद 'हाथ नहीं छोडऩा, साथ नहीं छोडऩाÓको अंतिम भाग के दृश्य के साथ पुन: डालना काफी असरकारक दिखता है। साहिर का जय से कहना ' समर को बचा लो, वो काफी मासूम है' आंखों में आंसू ला देगा। कलाकारों में आमिर ने दोहरे चरित्र को जिस तरह से जिया है, उसे देखकर लगता है यह केवल आमिर ही ऐसा कर सकते हैं। अभिषेक बच्चन भी अपनी गंभीर चरित्र के साथ एकाकार दिखते है। फिल्म में अगर अली नहीं होता, तो शायद 'धूम-३' एक बेहद गंभीर फिल्म बनकर रह जाती । अली हास्य का पुट लाने में बिल्कुल सफल रहा है। कैटरीना को जिस काम के लिए लिया गया है, उसमें उन्होंने आशातीत दिया है।
Thursday, December 19, 2013
फंस गए केजरीवाल
कांग्रेस-भाजपा सहित सभी दलों की मुश्किलें बढ़ाने वाले आप पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल खुद मुश्किल में नजर आ रहे है। दिल्ली में नायक बन कर उभरे केजरीवाल की हालत अब साप-छछूंदर वाली हो गई है। दिल्ली में जिस प्रकार से अप्रत्याशित परिणाम आए उसकी उम्मीद शायद केजरीवाल को भी नहीं थी। ये अलग बात है कि सर्वेक्षणों पर होने वाली बहस के दौरान योगेन्द्र यादव जरूर इस प्रकार के दावे करते नजर आते थे। खैर चुनाव परिणाम तो आ गए हैं और ऐसे आए कि दिल्ली में सरकार बनना ही असंभव सा लगने लगा है। भाजपा द्वारा खरीद-फरोख्त की उम्मीद लगाए केजरीवाल को निराशा हाथ लगी और भाजपा ने सरकार बनाने की जिम्मेदारी आप पार्टी के कंधे पर डाल दी। हमेशा मुखर विरोधी के रूप में दिखने वाली आप पार्टी बहुमत न होने का बहाना बना कर लागातार विपक्ष में बैठना चाहती थी। परन्तु उसकी योजना को मटियामेट करते हुए कांग्रेस ने आप पार्टी को सरकार बनाने हेतु बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा कर एक फिर से केजरीवाल को शूल भरे सिंहासन के पास पहुंचा दिया। पर केजरीवाल यहां भी कहां मानने वाले थे उन्होंने अपनी 18 शर्तों की एक लंबी लिस्ट भाजपा एवं कांग्रेस को भेज दिया। इससे भाजपा को कोई लेना-देना नहीं था अत: उन्होंने इसका कोई जबाब नहीं दिया और न ही निकट भविष्य में देने की संभावना है। परन्तु कांग्रेस के मंझे हुए राजनीतिक खिलाड.ी अपनी लुटिया डुबोने वाले केजरीवाल को यूं ही कहा छोड.ने वाले थे सो उन्होंने ने केजरीवाल के पत्र के जबाब में 16 शर्तें मानने एवं 2 दो शर्तों पर सहयोग करने का आश्वासन पत्र लिख भेजा। अब एक बार फिर गेंद केजरीवाल के पाले में है और अब देखना है कि केजरीवाल का अगल कदम क्या होता है? वैसे बहुमत न होने के बहाने के फेल हो जाने के बाद केजरीवाल अब जनता की राय लेने के बाद सरकार बनाने के विषय में राज्यपाल से मिलने की बात कह रहे है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि केजरीवाल ने अपने चुनावी एजेंडे में जनता से कई सारे वादे कर रखे हैं, जिन्हे पूरा कर पाना असंभव सा है, वहीं अल्प बहुमत की स्थिति में उन्हे और भी परेशानियों का सामना करना पड. सकता है। यह बात कांगे्रस भी बहुत अच्छी तरह से समझ रही है। यही कारण है कि कांग्रेस केजरीवाल को सत्तासीन करना चाह रही है। आप पार्टी के सरकार बनाने से कांग्रेस को एक साथ कई फायदें होंगे। अगर आप सरकार बनाती है, तो कांग्रेस के एजेंडे का सबसे प्रमुख बिंदु साम्प्रादायिक ताकतों (भाजपा) को सत्ता से दूर रखना अपने आप पूरा हो जाएगा। इसके साथ ही वे दिल्लीवासियों को एक बार फिर चुनाव से बचाने का श्रेय लेने में सफल रहेंगे। फिलहाल तो कांग्रेस जिस तरह से केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए आतुर नज़र आ रही है उससे तो सिर्फ एक बात दिख रही है कि चुनावी मैदान में केजरीवाल से मात खा चुकी कांग्रेस उसे राजनीतिक तरीके से पराजित करने के मूड में है। यह बात केजरीवाल को भी समझ में जरूर आ रही है। इसलिए केजरीवाल ने अपने बचाव के लिए आम जनता से सलाह लेने की आड. लेकर फिर अपने आप को सुरक्षित करने में लगे है और अगर इस बीच राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति शासन के लिए भेजा गया आग्रह सवीकार हो जाता है, तो केजरीवाल को नया बहाना मिल जाएगा कि हमें विचार-विमर्श का मौका ही नहीं मिला। परन्तु केजरीवाल यह आंकलन भी फेल होता दिख रहा है क्योकि गृहमंत्री सुशिल कुमार शिंदे ने यह साफ कर दिया है कि केंद्र सरकार दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगाने में कोई जल्दबाजी नहीं करेगी। अब देखना यह है कि केजरीवाल का अगला पैंतरा क्या होता है वे इस राजनीतिक चक्रव्यूह के अर्जुन साबित होते हैं या फिर अभिमन्यु?
अजीत राय
मो.-09323778226
17.12.2013
अजीत राय
मो.-09323778226
17.12.2013
Subscribe to:
Posts (Atom)




