Monday, May 20, 2013

विरह का बादल बहा दे काजल

विरह का बादल बहा दे काजल
पलकों की छतरी लगा दो ना
तरसे नयनवा मोरे सजनवा
आकर रूप दिखा दो ना
रूत बसंती आँख में सावन
तुम बिन सूना सूना आँगन
चंचल हवाएं लचकती डाली
भंवरा चूमे आली आली
दर्दे जवां में ऐसी फिजा में
आओ या मुझको बुला लो ना
रात कटे आँखों में हम दम
भाये ना भोर का भीगा मौसम
आस लगाये सबसे लडूंगी
सपने मिलन की मैं बूनूंगी
कोई हँसे ना कुछ भी कहे ना
आकर रीति निभा दो 

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